Tuesday, March 5

वृंद के 'सत सई' में नैतिक मूल्य - श्री दिलीप हुसेनी काम्बले (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ लक्ष्मण भोसले* कृत साझा संकलन "अक्षराभिषेक साहित्य का " )

   (गीता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित *डॉ लक्ष्मण भोसले* कृत साझा संकलन   "अक्षराभिषेक साहित्य का "  )  






वृंद के 'सत सई' में नैतिक मूल्य
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विषय प्रवेश

    जिसमें सब का हित हो, वही साहित्य है। साहित्य में समाज प्रतिबिंबित होता है। अर्थात हर साहित्य अपने मुल्क और काल को व्यक्त करता है। यह सर्वविदित है कि हिंदी साहित्य के बृहत इतिहास को प्रमुख रूप से चार काल खंडों में विभक्त किया गया है। आदिकाल, भक्ति काल, रीति काल और आधुनिक काल। प्रबुद्ध पाठक वर्ग इस विषय से भी अवगत है कि भक्ति काल सुवर्ण युग के नाम से जाना जाता है।


हिंदी साहित्य में नैतिक मूल्य

    सबसे बुनियादी प्रश्न उठता है कि संसार के किसी भाषा के साहित्य का मूल लक्ष्य क्या होता है? इस जटिल प्रश्न का सरल उत्तर होगा- 'साहित्य तो समाज का दर्पण होता है।  अर्थात समाज में हो रही घटनाओं का यथार्थ दर्शन करवाना ही साहित्य का लक्ष्य है, ध्येय है।

    'नीति' शब्द का संबंध नैतिकता से है। नीति से तात्पर्य लोकाचार की उस पद्धति से होता है, जिससे अपना कल्याण हो पर दूसरों की हानी न हो। इसी नैतिकता के गुण को मानव समाज में बनाए रखने की तडप हर सत्साहित्य में उभर कर आता है। प्लेटो ने  काव्य में (साहित्य में) नैतिक शिक्षा एवं लोक-मंगल की भावना का आग्रह किया है। अरस्तू ने भी नैतिक मूल्यों को सारे संसार के साहित्य में अनिवार्य माना। अपने त्रासदी के विवेचन में अरस्तू ने अनेक नैतिक आदर्शों की स्थापना की है। आदर्शवाद में नैतिकता पर ही अधिक जोर दिया गया है। मानवता साहित्य का आधार है और नैतिकता मानवता का आधार है।


कवि वृंद के दोहों में नीति

    जिस प्रकार सूरदास के पद, तुलसीदास की चौपाई और बिहारी के दोहे प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार वृंद के दोहे भी प्रसिद्ध हैं। वृंद ने हिंदी साहित्य की अद्वितीय सेवा की। उनके दोहे मार्मिक हैं जिनमें जीवन के अनुभव की गहराई है। यह सर्वविदित है कि कव वृंद ने नीति के सात सौ दोहे रचे, जो 'वृंद संतसई' के नाम से प्रसिद्ध है। यों तो वृंद ने अनेक ग्रंथ लिखे, पर  लोक नीति संबंधी इनके दोहे बहुत ही लोकप्रिय हैं। आपकी ख्याति का वास्तविक आधार ही उनकी नीति परक रचनाएं हैं।


करै बुराई सुख चहै, कैसे पावै कोई।

रोपै बिभा आक कै, आम कहॉं ते होई।।

    इस दोहे में वृंद कर्मवाद की पुष्टि करते हैं, जो मानवतावाद की बुनियाद है। बुरा काम करके सुख चाहना उचित नहीं। हम में से कुछ लोग कर्म पाप के करते हैं और फल पुण्य के चाहते हैं, जो कि प्रकृति के नियम से संभव नहीं है। आक का पौदा लगाने से , आक के फल ही मिलेंगे। आम कदापि नहीं मिलेंगे। कर्म का परिणाम सब को भुगतना पड़ता है। यथा कर्म, तथा फल नियम जो है प्रकृति का।


कुछ कहि नीच न छेडिए, भलो न वाको संग।

पत्थर डारै कीच में, उछरि बिगारै अंग।

    कवि वृंद बताते हैं कि नीच व्यक्ति को कभी नहीं छेडना चाहिए। जिस प्रकार कीचड में पत्थर फेंकने से वह उछलकर हमारे सारे शरीर पर गिरकर हमारी शोभा को भद्दी बनाता है, उसी प्रकार नीच लोग अपने साथ हमें भी बदनाम कराते हैं। अत: नीच लोगों की संगति वर्जित है। दुष्टों से दूर रहने में ही सज्जनों की भलाई है।


भले बुरे सब एक हो, जौ लौ बोलत नाही।

जानि परत है काक पिंक, ऋतु वसंत के माहि।।

    कवि वृंद इस दोहे में हमें कहते हैं कि बात-चीत करने के व्यवहार पर व्यक्ति के संस्कार और संस्कृति का पता चलता है। जब तक हम उनसे संवाद नहीं करते, तब तक अच्छे और बुरे लोग हमें एक जैसे ही लगते हैं। जैसे कि कौवा और कोयल देखने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन वसंत ऋतु के आने पर ही पता चलता है कि दोनों में कितना अंतर है। कोयल पंचम स्वर में जैसे गाती है, उसी प्रकार सुसंस्कृत व्यक्ति सही समय पर अपनी सज्जनता का परिचय देते हैं।


नैना देत बताय सब, हिय को हेत अहेत।

जैसे निरमल आरसी, भली बुरी कह देत।।

    कवि वृंद हम पाठकों को बडा सरल उदाहरण देकर समझाते हैं कि हमारी ऑंखे मन में के भले बुरे विचारों को बिना बताए ही व्यक्त करती हैं। किसी व्यक्ति के मन में द्वेष की भावना है या प्रेम भाव है, यह उस आदमी की ऑंखे बताती हैं। मनुष्य की ऑंखे आईने के समान होते हैं। जिस प्रकार साफ आईने में सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है, उसी प्रकार मनुष्य के विचारों को भी उसकी ऑंखे बयान करती हैं। इस उदाहरण के माध्यम से कवि वृंद हमें नीति बताना चाहते हैं कि 'मुॅंह में राम, बगल में चूरी' जैसा व्यवहार मनुष्य को शोभा नहीं देता।


निष्कर्ष

    कवि वृंद की नीति विषयक रचनाएं जन-जन की वाणी में निहित हैं। आपने अपनें दोहों में बहुत ही सरल भाषा-शैली में मानवीय आदर्शों को बयान किया है। यदि वृंद के संदेश को निजी जीवन में अपनाया जाए, तो यह पूरा मानव समाज आदर्श बन सकता है। वृंद के मार्गदर्शक तत्व हमारे लिए सदियों तक पथ-प्रदर्शन का काम करनेवाली अमर निधि है।

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संदर्भ ग्रंथ सूची

1.  हिंदी साहित्य का इतिहास: आचार्य शुक्ल

2.  हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास: डॉ. नगेन्द्र 

3.  कवि वृंद की कृति: वृंद सत सई


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© श्री दिलीप हुसेनी काम्बले

(MA, M Phil, BEd, PGDT)

(NET, SLET of Karnataka, Gujrat, J&K, Maharashtra, North-eastern states)

हिंदी लेक्चरर, जूनियर टेक्निकल स्कूल, बल्लारी, कर्नाटक। 9916083155

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